मुक्तक

मुहब्बत पैरहन बदलती है
कभी इस गली उछलती है
कभी उस गली फुदकती है
मुहब्बत सफ़र पे रहती है
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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