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मुक्तक

बुलन्दी की शिखा तक मैं, शिखा बन आस की चलती,
नयन में या किसी के मैं, शिखा बन ख्वाब की पलती।
शिखा हूँ मैं जले जाना , यही फितरत सदा से है,
मिटाकर तम दिलों का मैं, शिखा बन प्यार की जलती।

दीपशिखा सागर-

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Deepshika Sagar
Deepshika Sagar
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Poetry is my life