मुक्तक

अब मेरे आँखों में तुम आठो पहर रहते हो
नींद जरुरी नहीं ख़्वाब के लिए कहते हो ।

मैं अपनी पलकें मूंदूँ भी तो भला कैसे
तुम इस में ही करवटें बदलते रहते हो।

एक खुश्बू सी जो उठती है बदन से मेरी
तुम्हारी ही खुशबु है वो, ये तुम कहते हो !
…सिद्धार्थ

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