कविता · Reading time: 1 minute

मुक्तक

सादगी को रौंद के पुर्दिल महल न कभी बनाना तुम
दुनियाँ की रीत देख के जुबाँ पे छाले न उगना तुम…
/

बड़ी बेसब्र थी जुबाँ पे इश्क का नमक रख लिया
बातों-बातों में जुबाँ पे दर्द के छाले ऊगा लिया…
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२६-०४-२०१९
…पुर्दिल …

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