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मुक्तक

वो संघर्ष की भट्टी में सौ -सौ बार दहता है
तब कहीं जाकर के वो इन्साँ शेर बनता है,
तू है गीदड़ बात पर तेरी करे विश्वास क्या ?
तू कभी कुछ और फिर कुछ और कहता है

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