मुक्तक

अम्बर को चूमे है बेटी

ग़म में भी झूमे है बेटी

घर के सूने से आँगन में

बन पुरवा घूमे है बेटी

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*काव्य-माँ शारदेय का वरदान * Awards: विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित
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