मुक्तक

केशरिया वस्त्र पहन, मानो कोई संत आ गया।
सकुचाई शकुन्तला, उपवन में दुष्यंत आ गया।
मनहारी सकल सृष्टि, मादक सुगंध चहुँ दिश बिखरे –
सुप्त सपने सजाने, देखो वसंत आ गया।
-लक्ष्मी सिंह

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