मुक्तक

दो मुक्तक

उदय
उदयाचल से उदित हुआ नव रश्मि दिनमान
रक्तिम आभा फ़ैल गई धरती आसमान
नई किरण नई आशा प्रेरणा का स्रोत है
जीव जंतु बनस्पति सबको देता है प्राण |
अस्त
उदय गिरि से अस्ताचल तक आता है चलकर
अस्त होता है संध्या बेला बिलकुल थककर
चाँद तारे स्वागत में उनके हाज़िर नभ में
रात्रि विराम के बाद फिर उदित होता दिनकर |
© कालीपद ‘प्रसाद’

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