मुक्तक

” ज़मीं के चाँद को जब चाँद का दीदार होता है,
इबादत में मुहब्बत का नया विस्तार होता है,
तुम्हें ऐ चाँद हिन्दू देख लें तो चौथ हो जाए ,
मुसलमां देख लें तो ईद का त्यौहार होता है “

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