मुक्तक

“ज़ात,मज़हब,रंग के भेद अब सारे हुए,
आदमी था एक जिसके लाख बँटवारे हुए,
लफ़्ज़, जिनका था हमारी ज़िंदगी से वास्ता
आपके होंठों पर आकर खोखले नारे हुए “

Like Comment 0
Views 3

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing