मुक्तक

” सिपाही हूँ कलम की मैं तो मन की बात करती हूँ ,
नही हिन्दू और मुस्लिम की, वतन की बात करती हूँ,
हमें मत वास्ता देना कभी मंदिर औ मस्ज़िद का
रहें मिलजुल के मैं ऐसे जतन की बात करती हूँ “

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