मुक्तक - रोला छन्द में

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तुमसे मिलकर बात , समझ मेरे ये आई |
जीवन है सुर ताल , नहीं विपदा विपदाई |
कल तक थी ये शाम,घोर रजनी का आँचल
अब लगती है साँच , प्रिये तेरी अँगड़ाई ||
*
कहाँ छुपे हो स्याम , जगत में हुए अकेले
अब तो सहा न जाय ,उलझनें जगत झमेले
जपूँ रात दिन नाथ, नाम हरि हर की माला
कष्ट करो अब दूर , विपद के रोको रेले ||
“छाया”

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