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मुक्तक : “दिल-ए-नादां”

आनन्द कुमार

आनन्द कुमार

मुक्तक

February 13, 2018

इश्क़ का दीदार हर किसी को
नसीब नहीं होता
“शबाब-ए-हुस्न” का ख्वाब
हर किसी का पूरा नहीं होता ।

“दिल-ए-नादां” तू समझता क्यों नहीं
बिखर चुकी है, मिरी हयात
तू टूटकर बिखरता क्यों नहीं ।

महफूज जिसे तूने रखा है, अपने भीतर
जसारत से बाहर निकालता क्यों नहीं ।

न मिले वो तुझे, तू ग़म न कर
तू उन्हें, “दिल-ए-पत्थर”
समझता क्यों नहीं ।।

*मिरी हयात – मेरी ज़िन्दगी
*जसारत – दिलेरी
– आनन्द कुमार

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Author
आनन्द कुमार
From: हरदोई (उत्तर प्रदेश)
आनन्द कुमार पुत्र श्री खुशीराम जन्म-तिथि- 1 जनवरी सन् 1992 ग्राम- अयाँरी (हरदोई) उत्तर प्रदेश शिक्षा- परास्नातक (प्राणि विज्ञान) वर्तमान में विषय-"जीव विज्ञान" के अन्तर्गत अध्यापन कार्य कर रहा हूँ । मुख्यत: कविता, कहानी, लेख इत्यादि विधाओं पर लिखता हूँ... Read more
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