May 22, 2016 · कविता
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मुकरी

सब दिन पीछे पीछे डोले
कभि कुछ मांगे कभि कुछ बोले
डांटूं तो रो जावे नाहक
ए सखी साजन? ना सखी बालक।

तन से मेरे चुनर उङावे
मेरे बालों को सहलावे
इसका छूना लगता चोखा
ए सखी साजन? ना सखी झौंका

इसके बिन अब चैन न पाऊं
इसको खो दूं तो रो जाऊं
हर पल साथ में सहता कौन
ए सखी साजन? ना सखी फोन

गुन गुन कर के गीत सुनावै
सारी रैना मुझे जगावै
देह पे लिखता रक्तिम अक्षर
ए सखी साजन? ना सखी मक्छर।।
©
अंकिता

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Ankita Kulshreshtha
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शिक्षा- परास्नातक ( जैव प्रौद्योगिकी ) बी टी सी, निवास स्थान- आगरा, उत्तरप्रदेश, लेखन विधा-... View full profile
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