कविता · Reading time: 1 minute

मुकरी

सब दिन पीछे पीछे डोले
कभि कुछ मांगे कभि कुछ बोले
डांटूं तो रो जावे नाहक
ए सखी साजन? ना सखी बालक।

तन से मेरे चुनर उङावे
मेरे बालों को सहलावे
इसका छूना लगता चोखा
ए सखी साजन? ना सखी झौंका

इसके बिन अब चैन न पाऊं
इसको खो दूं तो रो जाऊं
हर पल साथ में सहता कौन
ए सखी साजन? ना सखी फोन

गुन गुन कर के गीत सुनावै
सारी रैना मुझे जगावै
देह पे लिखता रक्तिम अक्षर
ए सखी साजन? ना सखी मक्छर।।
©
अंकिता

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