मिला है दर्द जो तेरे निगाहों का असर है ये।

मिला है दर्द जो तेरे निगाहों का असर है वो।
पता मुझको नहीं था बेवफाओं का शहर है वो।

कई ही लोग मिटते रह गए है इश्क़ में पड़कर,
नहीं उसका नहीं यारों, सहारों का कहर है वो।

कहूँ मैं क्या कभी वो तो निकलते ही नहीं घर से,
सदा देखूं जिसे, ऐसे ही ख्वाबों का पहर है वो।

सलामत तो अभी हूँ फ़िक्र मुझको जो नहीं कल की,
खफा होता नहीं हूँ,,,,,, प्यार में जैसे जहर है वो।

सताना और समझाना हुनर है एक गर उसका,
अदाओ से भरी है वो, समंदर की लहर है वो।

भला करता नहीं कोई कभी औरों के खातिर क्यों,
लगे जैसे,, किसी के बद्दुआओं का असर है वो।

कहाँ मैं हूँ, कहाँ तुम हो, कहाँ मैं जानता था ये,
तुझे जो ढूंढता रहता शुभम् की ही नजर है वो।
-शुभम् वैष्णव

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