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मिथक

Jul 31, 2016 10:43 AM

कल्पना में मत उलझ
है मिथक सारा जगत
सत्य से रु-ब-रु हो
जन्म से आरम्भ जो हो
इससे परे मैं हूँ सदा
अदृश्य जो सदृश्य भी हो
तू बना क्यों ?उद्देश्य हैं क्या ?
ये भी सोचा है क्या ?
क्यों मिला ?मानस जन्म
करने हैं क्या तुझको कर्म
वोध ज्ञान भी हो कभी
है क्या तेरा भी कोई निज धर्म
छोड़कर आडम्बरों को
तोड़कर रुढियों को
प्रकाश को आयाम दे
स्वयं को भी विराम दे
चौधियां गेन आँखें तेरी
ओझल रचियता होने लगा
तकनीक का विकास कर
करता खुद ही बनने लगा
सारी सृष्टि की भांति ही
तू भी मेरी ही एक रचना
भटक गया जो राह से तो
कष्ट पड़े हैं आज सहना
मुझको तू पहचान ले
स्वयं को भी जन ले
प्यार कर और प्यार पा
प्यार को अंजाम दे
खुद को तू विश्राम दे
मत भाग तू कही और
सखे वो यही है तेरे वसे

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dr. pratibha prakash
dr. pratibha prakash
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Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त...
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