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मित्र का अनुरोध :कुछ राजनीति पर बोलो

मुकेश कुमार बड़गैयाँ

मुकेश कुमार बड़गैयाँ

कविता

February 15, 2017

मित्र क्या कहूँ? क्या बोलूं ?
राजनीति पर
खेल मदारी का
डमडम डमरू
भीड़ खड़ी है
विस्मय में सब
साँप बनेगा कब कपड़े का
टस के मस जो जरा हुए
तो लहू गिरेगा आँखों से
बीन बटोरीं जेबों की पूँजी
पैसे उनके कपड़े उनके
सुबह से हुई अब शाम

सब देख रहे भूखे पेट तमाशा
जादू होगा मजा आयेगा
बच्चे बूढ़े सबको एक ही आशा
कल कुछ थी आज कुछ और!
बदल रही है राजनीति-अब एक नहीं कोई नीति, न ही एक परिभाषा।
कवि-मुकेश कुमार बड़गैयाँ (कृष्णधर दिवेदी)

Author
मुकेश कुमार बड़गैयाँ
I am mukesh kumarBadgaiyan ;a teacher of language . I consider myself a student & would remain a student throughout my life.
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