मित्रता

कभी-कभी,
ऐंसा लगता है;
फुदक-फुदक कर,
चहक-चहक कर,
उड़ जाऊँ,
गौरैया जैसा ।
गुनगुनाऊँ,
गीत गाऊँ,
आम्र की
शाखा पर बैठी
कोयल जैसा ।
थिरक-थिरक कर,
नाच उठूँ मै ;
मृदु-कानन में
नाचे हुए ,
मोर के जैसा ।
यह सब संभव
हो जाता है ,
दुख भी सारा ,
खो जाता है ;
यदि आपके
पीछे कोई
संबल देता
मित्र आपका ।
तो,लगता है ऐंसे
जैसे उग आए
हों,पंख पींठ में ,
अब तो बस
उड़ना-उड़ना है ।
पवनाँजलियों से
निशिदिन ही,
ताज़े ग़ुलाबों
की गंध पीना है ।
छोड़-छाड़ कर
फ़िक्र पुरानी
दिन आज का
ही जीना है ।

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