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मिट्टी का पुतला लेकर मैं

मिट्टी का पुतला लेकर मैं
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चमकीली सी इन गलियों में, साक्ष्य जहाँ पर बिकते, माधव!
मिट्टी का पुतला लेकर मैं, रो-रो गला फाड़ता आया।

उत्प्रेरक वचनों से मोहित
युवा भटकते शहरों में,
कवि की बंध रहित उपमा भी
बँधी पड़ी है बहरों में;
चाल चली है चालबाज ने
ज्ञानीजन को भान नहीं,
संतों का आमिष हो जाना
मर्यादा-अपमान नहीं।
खद्योत सरीखी कलम लिये, महासूर्य से लड़ने आया;
मिट्टी का पुतला लेकर मैं, रो-रो गला फाड़ता आया।

सिंहासन के आकर्षण की
सीमा, नहीं सशंकित है,
गौरव को उस ध्यानस्थ करे
योग्य नहीं, कलंकित है;
नंगे-भूखों के चित्र पट्ट पर
हार चढ़ाये जाते हैं,
साकार वही दिख जायें तो
घृणित भगाये जाते हैं।
मानवता के हेतु कटोरा, हाथ में लेकर भागा आया;
मिट्टी का पुतला लेकर मैं, रो-रो गला फाड़ता आया।
…“निश्छल”

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अमित निश्छल
अमित निश्छल
देवरिया
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हिंदी में उन्मुक्त लेखन...