माफ़ कर देना माँ --- मातृ दिवस — माँ पर कविता — डी. के निवातिया

माफ़ कर देना माँ
तुझे मातृ दिवस पर याद नहीं किया मैंने
शायद गुम गया कही मातृ दिवस
तेरे निश्छल प्रेम की ओट में
हर क्षण जो छायी रहती है ह्रदय पटल पर
तेरे कोटि आशीषो की छत्र-छाया
किस पल नहीं होती तुम मेरे पास
अचानक चलते चलते जब ठोकर लग जाती है
अनायास ही निकल जाता है ओह ! माँ
हँसते हँसते किसी बात पर
जब दर्द करने लगता है उदर
स्वत: ही दोहरा जाता है
वही एक शब्द ओह्ह माँ…ओह्ह माँ
धरा पर कदम रखता हूँ तो याद आती है माँ
आसमा में चाँद को निहारु
तो पुनरावृति होती है मां-मां
बच्चो संग पत्नी का स्नेह देखता हूँ
बचपन की यादो में खो जाता हूँ
आँखों में फिर वही अक्स उभर आता है
जहन में तुम्हारा ही तो बसेरा होता है
कितनी अनगिनत भाव है
शब्दों में कैसे ब्यान करूँ माँ
एक तेरे ही रही करम से दुनिया में अस्तित्व है मेरा
तेरे सिवा इस दुनिया में क्या कुछ है मेरा
भले ही दूर बैठी हो तुम मगर
मेरे इर्द गिर्द सैदव तेरा साया रहता है
रोज़ कुछ ऐसा होता है
जब अनायास ही मुख से माँ निकल जाता है
मुझे माफ़ करे देना माँ
मातृ दिवस मेरे लिए कोई महत्व नहीं रखता
मेरे लिए तेरा होना ही सब कुछ है
दिखावे की इस दुनिया मैं बोना हूँ
तेरी नजर में तो आज भी सोना हूँ
अपना साया दूर न होने देना माँ
मुझको तुम कभी ना रोने देना माँ !!

शायद इसी में खो जाता है मेरा मातृ दिवस माँ
मुझको माफ़ कर देना माँ मुझको माफ़ कर देना माँ

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डी. के निवातिया

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