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मालती माधव छंद

माधव मालती छंद
2122, 2122, 2122, 2122
नेह निर्मल दृष्टि ने जब इस वदन तन को छुआ है।
प्रेम का अंकुर हृदय में प्रस्फुटित तब से हुआ है।
शीत की नित गुनगुनी सी धूप का फैला उजाला।
देख उनको भावनाओं का उदधि उमड़े निराला।।

देश हित में हर प्रदूषण है हमें मिलकर मिटाना।
धर्म को ला बीच में अब मत करो कोई बहाना।
गंदगी या हो प्रदूषण सब मिटा कर दो उजाला।
राष्ट्र अपना बन सकेगा विश्व में बस तब निराला।।
डाॅ. बिपिन पाण्डेय

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डाॅ. बिपिन पाण्डेय
डाॅ. बिपिन पाण्डेय
सीतापुर
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साहित्य अध्येता Books: साझा संकलन कुंडलिनी लोक (संपादक - ओम नीरव) संपादित दोहा संगम (दोहा...
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