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माया का संसार

तृष्णा माया संगिनी
जैसे दिन और रात
एक आयी तो
दूजी दूर नही
जैसे बूँद और प्यास ।

मानव फिरे उम्र भर
जैसे पृथ्वी घूमे
दिन और रात
तृप्ति फिर भी मिले नही
आधा अँधेरा
आधा रहे प्रकाश ।

जितना कमाओ छोड़ना
जैसे साँप की काँच
मुक्ति जीवन को तभी मिले
जितना खाली थैला
जाय साथ ।

स्वाद जीव का सुरसा
जैसा
बढ़ाता रहे आकार
जीत मनुष्य को तभी मिले
जो रखे
हनुमान जैसा विचार ।

माया का यह प्रेम है
सपनों सा संसार
आँख मूँदते ही
गुम हो जाए
मन का मायाजाल ।

लोभ लालच में
डूबा प्राणी
मछली बन
माया से ले जीवन की सांस
बाहर खींचे दम निकले
तड़फ तड़फ के
खुद ही जीवन करे समाप्त ।

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