मायके

कुवार का महीना था रिमझिम बरसात का मौसम था और अगले दिन शारदीय नवरात्र चढ़ने वाला था। उस दिन मैं दोपहर तीन बजे के करीब सो कर उठा तो देखा कि मां खेतों से घास काट के आई और डेली लेदी कटा घर में रख दी और झटपट तैयार होने लगी। मुझसे बोली बेटा तू भी तैयार हो जा और मुझे अपने ननिहाल पहुंचा दे।

बात यह थी कि उस दिन दिनभर रुक-रुक कर बारिश हुई थी और उस समय भी बारिश होने की संभावना थी जिसके कारण समय दोपहर हो गया था। उस समय घर पर सब कोई उपस्थित था जैसे की भाभी, पिताश्री, बड़े भैया आदि पर किसी को यह हिम्मत नहीं हो रहा था कि वह कह दे जे ए मां आज रुक जा क्योंकि दिन भर बारिश हुई है और फिर बारिश होने की संभावना है, कल मायके चले जाना। डरते – डरते मैंने कहा मां आज रुक जा बारिश हो रही है, कल चले जाना पर मां नहीं मानी। अगर एही बात भाभी कहती की ए मां आज रुक जाइए कल मामा जी के यहां चले जाइएगा तो मां यह कहती की तुमको जाना होता है तो अपने भाई को बुला करके अपने मायके चले जाती है और मेरे मायके से फोन आया है और जा रही हूं तो सब बारिश का बहाना बनाकर रोक रहा हैं। इसी के कारण किसी ने मना नहीं किया।

बस मां मानने वाली कहां थी? झटपट तैयार हो गई और मैं भी तैयार हो करके बाइक निकाल ली। मां को गाड़ी पर बैठाया और अपने मोतीपुर गांव से निकल करके महज तीन किलोमीटर दूर जैसे ही बलुआ रमपुरवा गांव में पहुंचा की बारिश होना शुरू हो गई। बस सड़क के किनारे एक गुमटी थी, उसी गुमटी में बारिश से बचने के लिए छिप गयें।

कुछ देर तक बारिश होने लगी तब मैं मां से बोला मां आप से घर पर ही बोला था कि आज मत जाओ पर आप नहीं मानी अभी से कहता हूं। यहां से घर चला जाए ज्यादा दूर हम लोग नहीं आ पाए हैं। नहीं तो मामा जी के यहां जाते – जाते रास्ते में ही हमलोग भीग जाएंगें। अब मां को लगा कि हम इन्हें घर लौटा ले जाएंगे। जिसके वजह से उन्होंने कहा बेटा चलो हमलोग चलते हैं। इसी बारिश में, धीरे-धीरे तो बारिश हो रही है। मुझे समझ में आ गया की मां मानने वाली नहीं है। बस मैं कुछ देर के लिए चुप हो गया और बोला मां ठीक है आपकी इच्छा है तो मैं पहुंचाऊंगा लेकिन थोड़ा बारिश धीमी हो जाए तो चला जाएगा। तब तक बारिश धीमी हो गई और फिर मैंने गाड़ी स्टार्ट किया और चल दिया। कुछ दूर आगे बढ़ा तब तक पेट्रोल पंप मिला वहां से तेल गाड़ी में डलवाया। तब तक फिर तेजी से बारिश होने लगी। अब वहां भी रुकना पड़ा। उस समय मैंने देखा कि मां के अंदर मायके जाने को लेकर बहुत ही उमंग और उत्साह हैं। इससे मुझे लगा कि मां को पहुंचा देना ही ठीक है। तब तक बारिश छूट गई। फिर मैंने गाड़ी स्टार्ट किया और चल दिया जैसे ही मैंने एक चौक को पार किया। तब तक मां अचानक से बोली, बेटा ए कौन सा चौक है? मैंने बताया की यह नाथ बाबा चौक है। कुछ देर आगे बढ़ा तो फिर उन्होंने पूछा, बेटा ए कौन सा गांव है? फिर मैंने बताया की मां यह नाथ बाबा चौक से आगे की ओर जितना हमलोग आए हैं, ये सारे बगही गांव में आते हैं।

इस तरीके से वह अजीबो – गरीब सवाल पूछ रही थी और उनके अंदर बहुत ही उमंग और उत्साह था मायके जाने को लेकर। ऐसा लग रहा था जैसे कोई नई नवेली दुल्हन जो पहली बार अपने मायके जा रही है। ऐसा नहीं था कि वह पहली बार अपने मायके जा रही थी या बहुत दिनों के बाद जा रही थी। कई बार अपने मायके गई है, गाड़ी से गई है, पैदल भी गई है और उसी रास्ते से गई है। उसके बावजूद भी आज अजीबो – गरीबों बातें सुनने को मिल रही थी। अब इस सारी बातें को सुनकर मुझसे रहा नहीं गया और मैं मां से पूछ लिया की मां इस बार मामा जी के यहां जाने को लेकर आपके अंदर इतना उमंग और उत्साह क्यों हैं? तब मां ने बताया कि देखो बेटा ऐसा सौभाग्य मुझे बीस वर्षों के बाद मिली हैं। क्योंकि इसी तरह बीस वर्ष पहले शारदीय नवरात्र के शुभ अवसर पर मुझे मायके के से बुलावट आई थी। उस समय तुम्हारी नानी जिंदा थी और मैं यही पर नवरात्र की थी। फिर वही सौभाग्य मुझे आज प्राप्त हुई है कि मेरी मां के गुजर जाने के बाद पहली बार शारदीय नवरात्र के शुभ अवसर पर मुझे बुलाया गया है और इस बार के नवरात्र यही पर करुंगी।

तब जाकर मुझे समझ में आया कि मायके जाने को लेकर मां इतना उत्साहित क्यों थी? लेकिन एक बात यह भी सच है कि औरत कभी भी अपने मायके जाने को लेकर हमेशा उत्साहित रहती हैं।

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