कविता · Reading time: 1 minute

माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी

माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी !
अब रोईथे करम का अपने खुब देइथे गारी !!

सुधि आबाथी लेहे कधइया विद्यालय पहुचउते !
रोटी, पूड़ी, अउर परेठा कपड़ा, लत्ता धोउते !!

बात बात मा गुस्सा होइके पोथी पत्रा जारी !
माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी !!

नीक सिखाये सबदिन हमही अपन बिपत बताये !
फटी चिटी धोती तै पहिने हीरो हमही बनाए !!

फुरिन कहेतै पढ़ि ले लाला नही बगबे लेहे अधारी !
माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी !!

बेउहर बाबा के लड़िकन के सउज किहन हम सबदिन !
गुट्का पाउच बीड़ी दागी गामव बाले बरजिन !!

देख रवइया हमरव भइया खूब रोबय महतारी !!
माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी !!

पढ़य लिखय का मन ना लागय खेली गुल्ली डंडा !
नेबुआ, बीही, जामुन टोरी बागी लइ के झंडा !!

आन के माथे हमहू दादा पटक पटक के मारी !
माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी !!

फैल होइगैन दशमी मा ही भागिके शहर मा आयन !
बात का तोरे सुधि कइके हम रोय रोय पछितायन !!

पढ़ें लिखे जो होइत अम्मा होती सरहज सारी !
माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी !!

फौज, पुलिस कुछ नेता होइगे हितुआ आपन साथी !
फिरी लोकइया कस घोड़ी हम भुई से बादल चाटी !!

कवि जुगनू जी एइन बनाइन मिसिरा दुबे तिवारी !
माफ किहे तै हमही अम्मा नहीं बनन अधिकारी !!

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