कविता · Reading time: 1 minute

मानव जीवन

मानव जीवन / दिनेश एल० “जैहिंद”

कौन जाना वह जीवन क्यों पाया ।।
इस धरती पर वह क्योंकर आया ।।
यह जीवन तो है एक कठिन प्रश्न,,
मानव कभी इसे सुलझा ना पाया ।।

है जीवन एक रहस्यमयी हवेली ।।
हुआ है जीवन की जीवन सहेली ।।
जीवन से जीवन है यहाँ उजियाया,,
पहला जीवन तो है अभी पहेली ।।

मर गए कितने यहाँ बड़े विज्ञानी ।।
जवाब ना पाए याद आयी नानी ।।
अनबूझ प्रश्न रह गया दुनिया में,,
समझ ना पाए जीवन की कहानी ।।

कोई कहे जीवन काँटों की शय्या ।।
कोई कहे जीवन है तैरती नैय्या ।।
कोई कहे जीवन है एक गुलदस्ता,,
कोई कहे यह जीवन प्रेम है भैय्या ।।

जीवन तो है एक कीमती उपहार ।।
जीवन तो है एक अनमोल प्यार ।।
जीवन तो है एक कड़वी सच्चाई,,
जीवन तो है एक दोधारी तलवार ।।

कोई हँसते-हँसते जिता है इसको ।।
कोई रोते-रोते सहता है इसको ।।
कोई ज़हर खाकर जैसे मर जाए,,
कोई असर नहीं होता है इसको ।।

एक बड़ा पेचीदा सवाल है जीवन ।।
कहीं खिला है तो कहीं डूबा है मन ।।
मन बेमन है कहीं तो कहीं गदगद,,
कहीं दु:खी है तो कहीं है यह प्रसन्न ।।

जीवन की नाहीं है परिभाषा कोई ।।
जीवन में इक आशा व निराशा दूई ।।
जीवन यह उसी का होता है “जैहिंद”,,
जीवन में हिम्मत जिसने भी पिरोई ।।

=== मौलिक ====
दिनेश एल० “जैहिंद”
29. 04. 2017

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