23.7k Members 50k Posts
Coming Soon: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता

मानवता ही एक मात्र धर्म

.
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
इंसानियत को जात धर्म में न बनाया जाए

आपसी प्रेम इतना गहरा हो पड़ोसी रहे दंग
प्रेम और सौहार्द ख़ूब खिल खिलाया जाए

एक रंग का ख़ून दोड़ता हिंदू मुसलमानो में
धर्म के आड़ अब किसिको न गिराया जाए

ख़ून और मज़हब जब है एक समान हमारा
क्यूँ न हम अब बँटवारों को ही भुलाया जाए

जात और मज़हब से ऊँचा रहे वतन हमारा
मानवता ही मात्र धर्म सबको दिखाया जाए

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई रहे सभी भाई
भाईचारे को ‘राज’ हर तरफ़ फैलाया जाए

✍?..राज मालपाणी
शोरापुर – कर्नाटक
8792143143

6 Views
Raj Malpani
Raj Malpani
3 Posts · 97 Views
You may also like: