कुण्डलिया · Reading time: 1 minute

#कुंडलिया//माँगें

माँगें हक की कीजिए , लेना निज अधिकार।
रहना बने गुलाम तुम , करो नहीं स्वीकार।।
करो नहीं स्वीकार , बराबर सबका हिस्सा।
दाता का उपहार , आपका सच्चा किस्सा
सुन प्रीतम की बात , नहीं मानवता लाँघें।
हद में रहकर चाह , पूर्ण हों जायज़ माँगें।

#आर.एस. ‘प्रीतम’

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