माता वैष्णो देवी धाम

माता वैष्णो देवी धाम दर्शन

जून के महीने में धूल भरी लू चल रही थी। दोपहर के वक्त लोग घरों में ही कैद हो जाया करते हैं। हम भी अपने छोटे से मकान में आराम कर रहे थे। नींद आने का तो सवाल ही नहीं था। एक ही फ्लोर बना होने के कारण छत गरम हो चुकी थी इसलिए सीलिंग फैन भी किसी भट्टी से आने वाली हवा के समान ही आभास हो रहा था। हमारे कस्बे में गर्मियों में विद्युत आपूर्ति भी चार या पांच घंटे की ही थी। इनवर्टर भी बड़ी कंजूसी से चलाना पड़ता था। कमरे में पड़े तख्त पर करवटें बदलकर शाम होने का इंतजार कर रहे थे, तभी मोबाइल की घंटी बजी। सतेन्द्र जी का फोन था, बोले वैष्णोदेवी दर्शन करने जाओगे? चूंकि वैष्णो देवी माता के दर्शन की इच्छा बहुत दिनों से मन में पल रही थी इसलिए इनकार नहीं कर सका, छुट्टियां भी थीं। सतेन्द्र जी ने कहा आप चलने की तैयारी करो टिकिट कराने का सिरदर्द मेरा है। मेरे लिए ये किसी सरप्राइज से कम नहीं था। गर्मियों की छुट्टियों में घूमने का मज़ा ही कुछ अलग होता है। पहाड़ों पर घूमना सौभाग्य की बात थी, पत्नी ने भी कहा चलो चार-छः दिन इस बेशर्म गर्मी से तो निजात मिलेगी कम से कम।
हमारी शादी को पांच वर्ष पूरे हो चले थे, नौकरी और शादी में दो -ढाई महीने का अंतर था, मेरी पहली पोस्टिंग बस्ती जनपद में हुई जो कासगंज जनपद से साढ़े पांच सौ किलोमीटर की दूरी पर है। नई-नई नौकरी और नई-नई शादी दोनों में सामंजस्य बिठाना काँच के टुकड़ों पर नंगे पांव चलने जैसा था। शादी से पहले ही हर लड़का-लड़की की आंखों में ख़्वावों का संसार बस चुका होता है, जबकि हकीकत कुछ और ही निकलती है। आदमी की सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताएं उसके सपनों पर पत्थरों के प्रहार का काम करती हैं।
सतेन्द्र जी के छोटे भाई कुलदीप जो प्रयागराज विश्वविद्यालय से एल एल बी कर रहे हैं, दोनों बड़ी बहिनें राजकुमारी और लक्ष्मी, राजकुमारी के पतिदेव अध्यापक हैं, दो बेटे एक कि उम्र 11 वर्ष और एक लगभग 3 के होंगे, लक्ष्मी काशी विश्वविद्यालय से बी डी एस कर रही थी। नीरज और हरेन्द्र, सतेन्द्र जी के बड़े मामाजी के बच्चे भी साथ थे। तीन हम लोग बेटा कुशाग्र, पत्नी अर्चना और मैं कुल 11लोग थे यात्रा में। मथुरा जंकशन से कटरा तक का रिजर्वेशन था।
पहले कासगंज से मथुरा जाना था पैसेंजर ट्रेन से, सत्येन्द्र जी अपनी चार पहिया गाड़ी से पहले हमें कासगंज के रेलवे स्टेशन छोड़ कर दो चक्करों में बाकी लोगों को। पैसेंजर ट्रेन में सफर का आनंद भी अपने में अलग ही होता है। ऐसा लगता है कि जैसे पूरी दुनिया सफर ही कर रही है, कोई भी स्थिर नहीं है। कोई किसी शादी समारोह में जाने के लिए सफर में है, कोई किसी बीमार को डॉक्टर के पास ले जा रहा है, कोई पढ़ने जा रहा है तो कोई पढ़ाने के लिए सफर में है। कोई नौकरी की चाह में दौड़ रहा है तो कोई नौकरी बचाने को दौड़ लगा रहा है। भगदड़ सी मची है। किसी की निगाह गाड़ियों के टाइम टेबल पर है तो किसी की गाडी में खाली सीट पर। किसी की निगाहें अपने साथी के इंतजार में प्रवेश द्वार पर गढ़ी हैं तो कोई उपरिगामी पुल की सीढ़ियां गिन रहा है। कोई फुर्सत में है तो बुकस्टाल पर किसी किताब के पन्ने उलट रहा है। गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए कोई ठंडे पानी से गला तर कर रहा है। कोई पानी की तलाश में खाली बोतल लिए इधर उधर भटक रहा है। टी0 टी0 की निगाहें बिना टिकिट यात्रियों के चेहरे पढ़ने में लगीं हैं। जी0 आर0 पी0 वाले अपना शिकार ढूंढ रहे हैं। कुल मिलाकर हर आदमी की आंखों में अपनी मंजिल तक पहुंचने का अरमान है। हम भी सवार हुए और चार लोगों की सीट पर सात लोग अडजस्ट हो गए।
भीषण गर्मी के कारण पानी का पूरा बंदोबस्त किया था। 10 लीटर का वाटर कूलर, दो-दो लीटर की कोल्डड्रिंक की बोतलें और एक-एक लीटर की बिसलेरी की बोतलों में भी पानी भर लिया था। 3 छोटे -छोटे बच्चों को साथ लेकर पानी के लिए भटकना समझदारी की बात नहीं थी। तत्काल रिज़र्वेशन में टिकट कराया था। कुल 11 लोग यात्रा पर जा रहे थे टिकट 9 ही हुए, माता वैष्णो देवी का नाम लेकर 2 जनरल टिकिट लेकर रिज़र्वेशन वाले डिब्बे में ही चढ़ना था। रेल यात्रा में जब परिचित लोग साथ हों तो यात्रा के कष्ट मालूम नहीं पड़ते जबकि यात्रा का आनंद दोगुना हो जाता है। विशेषकर जब छोटे बच्चे साथ हों तो उनकी तोतली बातों और बालहठ सुनते -देखते वक्त की फिसलन पता भी नहीं चलती। पास में बैठे यात्रियों के चर्चा के रोचक प्रसंग अनायास ही बोलने पर मजबूर कर देने वाले होते हैं। धन्य हैं रेलगाड़ी बनाने वाले जिन्होंने लघुशंका और शौच से लेकर शयन तक का इंतजाम कर घर जैसा अहसास प्रदान किया है। स्लीपर के डिब्बे में अपने अपने बैग, पानी का वाटरकूलर, बोतलें इत्यादि को ठीक से लगाना भी किसी कला से कम नहीं होता।
शाम को 3 बजे मथुरा स्टेशन पहुँचकर वेटिंग रूम में अपना सामान जमा कर आराम करने लगे। मथुरा से कटरा तक जिस ट्रैन से जाना था वह लेट चल रही थी, लक्ष्मी और कुलदीप ने मौके का फायदा उठाया और श्रीकृष्ण जन्मभूमि के लिए निकल गए। दो घंटे बाद लौट आए तब तक हमारी ट्रेन के भी आने की सूचना लाउड स्पीकर से होने लगी। रिजर्वेशन ए सी में था इसलिए गाड़ी में बैठकर चैन की सांस ली। रात का खाना घर से ही लाए थे, खा पीकर चादर तान के सो गए। ट्रैन में बैठकर बाहर की भीषण गर्मी को भूल चुके थे। रातभर बिना करवट लिए सोए। सुबह कब हुई पता ही नहीं चला।
अगले दिन शाम को करीब 4 बजे ट्रैन कटरा स्टेशन पहुंची। स्टेशन के बाहर आते ही माता के दरबार तक पहाड़ों पर बने रास्ते दूर से नज़र आ रहे थे। मनमोहक दृश्य पूरा पहाड़ लाइटों से जगमगा रहा था। ऊपर तक कैसे पहुंचेंगे ये सोचकर मन में कुछ घबराहट भी थी थोड़ा रोमांच भी। ट्रैन से उतर कर ऑटो रिक्शा पकड़कर हम लोग कटरा शहर में पहुंचे। बस स्टैंड के पास ही एक होटल में पहुंच कर नहा-धोकर जरूरत भर का सामान लेकर शेष सामान लॉकर में रखवा दिया। माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के काउंटर से पास लेकर चेकपोस्ट होते हुए माता के दर्शन करने के लिए पहाड़ों पर चढ़ना प्रारम्भ किया। माता वैष्णो देवी के दरबार तक पहुंचने के किए हेलीकॉप्टर भी चलते हैं। बुजुर्गों के लिए पालकी द्वारा दर्शन की व्यवस्था है। घोड़ों और खच्चरों से भी लोग ऊपर तक जाते हैं। चूंकि हम लोग संख्या में अधिक थे इसलिए साथ बोलते -चालते, रुकते – रुकाते मौज मस्ती के साथ ही चढ़ाई करने का निश्चय किया। चलते- चलते ऐसा लगा कि रास्ते में कहीं बच्चे परेशान न करें, किन्तु बच्चों ने न केवल पूरे रास्ते मौजमस्ती की बल्कि हम लोगों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। लगभग आधे रास्ते में अर्धकुमारी का गुफा में स्थित मंदिर था। इस मंदिर के आसपास काफी जगह समतल थी, रुकने के लिए धर्मशाला और भोजन के लिए दुकानें भी बनीं हुई थीं। अर्धकुमारी के मंदिर में प्रवेश के लिए वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के पास लेना पड़ता था।काउंटर से हमने पास बनवाए, पता चला कि भीड़ ज्यादा होने के कारण लोग तीन तीन दिन से लाइन में लगे हैं। रात के करीब 12 बज चुके थे। हम लोग भूखे भी थे और थक भी चुके थे इसलिए पहले भोजन किया फिर धर्मशाला से कंबल निकलवा कर आराम करने लगे। लेटते ही नींद आ गयी। सुबह उठकर फिर पता किया तो पता चला कि अर्धकुमारी मंदिर में दर्शन आज भी मिलना मुश्किल हैं। हमने आगे बढ़ने का निश्चय किया और पुनः चढ़ाई करने लगे। जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे वैसे-वैसे मौसम सुहाना होता जा रहा था। जब हम लोगों ने चढ़ाई शुरू की थी तब तक पहाड़ की खूबसूरत वादियां रात के अंधकार में आराम करने जा चुकीं थीं, सूरज की किरणों से मस्तियाँ करने को वो अब आ चुकीं थीं। ऊंचे पहाड़ों से नीचे देखकर खुद को शाबाशी दे रहे थे ये सोचकर कि हम बहुत ऊंचाई पर बिना थकावट के पहुँच गए। मुख्य मंदिर के बाहर काफी जगह का समतलीकरण कियाया गया था। यहां भीड़ का दबाव भी ज्यादा रहता है। रात में तो फोटो खींचने का कोई मतलब ही नहीं था इसलिए मंदिर परिसर पहुँचकर सबने अपने अपने मोबाइल कैमरों के हुनर दिखाने शुरू कर दिए। मेरे पास भी 20 मेगा पिक्सेल का सोनी का कैमरा था। नीरज ने बैग से कैमरा निकलवा लिया और खूब जमकर फोटोग्राफी की।
माता वैष्णो देवी के धाम में लोग बड़ी श्रद्धा से आते हैं। दूषित मानसिकता और अहंकार नीचे ही बहुत दूर छोड़कर विनम्रता के साथ दरबार में दाखिल होते हैं। मन से तो शुद्ध थे ही हम सोचा शौच एवं स्नानादि करके ही मां के गर्भगृह में प्रवेश करेंगे। नहा- धोकर बैग लॉकर में रखने चले, सोचा एकबार मोबाइल, कैमरा आदि कीमती सामान चेक कर लें। बैग में हाथ डाला ही था, भीषण ठंडे वातावरण में शरीर पसीने से तरबतर हो गया। हृदय के धड़कनों की आवाज और रफ्तार चार गुना हो गयी। पत्नी ने मेरे चेहरे की उड़ती रंगत देखकर कहा ‘तबियत तो ठीक है’ मुझे शब्द नहीं सूझ रहे थे । बहुत हिम्मत जुटा कर बताया बैग में कैमरा नहीं है। सब लोग कैमरे के खोने की खबर सुनकर सन्न रह गए। हंसते मुस्कराते फूल से खिलखिलाते चेहरे एकदम मुरझा गए। माहौल में उदासी ही उदासी छा गई। सब अपने अपने तरीके से दुख व्यक्त कर रहे थे। मेरा मन भी बहुत व्यथित हो गया। इधर उधर जहां जहां हम लोग उठे बैठे थे काफी तलाशा लेकिन कुछ पता नहीं चला। मैंने खुद को और पत्नी को यह कहकर समझाया कि ‘माता वैष्णो देवी के आशीर्वाद से ही दुनिया चलती है। माँ की कृपा से ही कैमरा खरीदा था , मां के दरबार में ही खो गया।’
बहुत विचारणीय प्रश्न ये है कि इस तरह का अपराध आखिर लोग क्यूँ करते हैं? ऐसा करते समय उनकी आत्मा क्यूँ मर जाती है? क्या करते होंगे वो लोग जिनके पर्स चोरी कर लेते हैं ऐसे लोग? कैसी गुजरती होगी उन लोगों पर जिनके बहुत जरूरी कागजात या जेवर चुरा लेते हैं ऐसे लोग? बहुत से सवालों से उलझते सुलझते पता चला कि यहां पर कुछ संगठित चोर स्थानीय प्रशासन की मदद से ऐसे काम को अंजाम देते हैं। ये लोग दर्शनार्थी बनकर श्रद्धालुओं के बीच घुल मिल जाते हैं। चूंकि माता के दर्शन को जाने वाले भक्त जय माता दी के जयघोष में ऐसे मक्कारों के वहां होने का अहसास भी नहीं कर पाते हैं, और ये चोर अपने गंदे धंधे को बखूबी चलाते रहते हैं। हज़ार पांच सौ किलोमीटर से आने वाला शृद्धालु इधर उधर के पचड़ों में न पड़कर अपने नुकसान को बिना किसी को बताए चुपचाप सह कर चला आता है। अगर रिपोर्ट भी दर्ज कराने जाता है तो सिवाय समय की बर्बादी हाथ में कुछ नहीं आता। इसलिए हम इस घटना को एक बुरा सपना समझकर भूलने का प्रयास करने लगे और श्राइन बोर्ड के काउंटर से प्रसाद खरीदकर माता के दर्शन के लिए लाइन में लग गए। सुन्दर गुफा में प्रवेश कर तन और मन दोनों शीतलता से सराबोर हो गए। महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली तीनों के पिंडी रूप में दर्शन लाभ लिया। माता जी के दर्शनोपरांत भैरवनाथ के दर्शन के लिए और भी ऊपर पहाड़ी पर चढ़े, मान्यता के अनुसार भैरवनाथ के दर्शन माताजी के दर्शन के बाद जरूरी होते हैं। भैरवनाथ मंदिर की चढ़ाई ज्यादा कठिन थी फिर भी ईश्वर की आस्था के आगे बहुत सरल प्रतीत हो रही थी। भैरवनाथ मंदिर में ज्यादा भीड़ नहीं मिली इसलिए जल्दी ही दर्शन कर वापिस लौटने लगे। उछलते कूदते बच्चों का उत्साह भी कम होने का नाम नहीं ले रहा था। ‘सांझी की छत’ पर आराम करने के लिए सीटें बनी हुई थीं, धूप में शरारत का भाव साफ दिख रहा था। थोड़ी देर रुक कर प्रकृति का नज़ारा देखने का मन हुआ। लंगूर पेड़ की टहनियों पर करतब दिखा रहे थे। यहाँ से कटरा का वह स्थान जहाँ से हेलीकॉप्टर श्रद्धालुओं को लेकर उड़ान भरते हैं और वह पहाड़ी जहां उतरते हैं स्पष्ट दिखता था। बेटे कुशाग्र और राजकुमारी के दोनों बच्चों ने हेलीकॉप्टर की उड़ान देखकर का भरपूर लुत्फ लिया। देखते ही देखते ही देखते बादलों ने विकराल रूप धारण कर लिया। पहाड़ों पर जहां सूर्य की आंख मिचौली चल रही थी, इस प्यार के खेल को नए मुकाम पर ले जाकर बादलों ने दहकते सूर्य को अपने आगोश में ले लिया। बादल सूर्य के चारों ओर उमड़ते गुमड़ते अपनी जवानी की दहाड़ जमीन तक पहुंचाने लगे और घर्षण से उत्पन्न विद्युत से ये संदेश देने लगे सूरज! तुम अपनी चमक पे मत इतराना, रोशनी हम भी पैदा करते हैं। दोनों के प्रणय की परिणति ऐसी हुई कि झमाझम बूंदे टपकने लगीं। मौसम में एक सौंधी सी गन्ध महकने लगी क्योंकि पहाड़ों की तपती मिट्टी पर बूँद पड़ने से जो वाष्प बन रही थी उसी की खुश्बू थी। श्राइन बोर्ड के लगे माइक से जगह जगह लगे लाउडस्पीकर चेतावनी देने लगे कि जो लोग रास्ते में हैं शीघ्रता से नीचे आ जाएं, या अर्धकुमारी पर रुकें, बारिश की वजह से चट्टाने टूटने से जनहानि हो सकती है। शीघ्रता से हमलोग अर्धकुमारी पहुंचे। मंदिर पर जाकर पता कि आज भी दर्शन संभव नहीं हैं इसलिए धर्मशाला से कम्बल लेकर आराम करने का मन बनाया। हल्की हल्की बारिश पड़ ही रही थी। अगले दिन गुफा में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और मंदिर में दर्शन किए। अर्धकुमारी से सीधे कटरा के लिए प्रस्थान किया। चैकपोस्ट पर आकर हम सब बिछड़ गए। अर्चना , मैं और कुशाग्र सीधे होटल पहुंचे जबकि बाकी लोग चेकपोस्ट के पास नदी में नहाने के लिए रुक गए थे। देर शाम तक सब लोग होटल में पहुंचे।
रिजर्वेशन वापसी का नहीं था। कासगंज में सतेन्द्र जी लगातार तत्काल रिजर्वेशन कराने में लगे हुए थे। एक दिन बाद का रिजर्वेशन फाइनल हुआ। एक पूरा दिन और हमें कटरा में ही काटना था क्योंकि अगले दिन शाम 8 बजे ट्रैन थी, लिहाजा अगले दिन कटरा से ‘नौ देवी’ जा पहुंचे। यहां का वातावरण सुरम्य और मनोहारी था। सीढ़ियों के बीच बना कृत्रिम झरना इस स्थान की शोभा में चार चांद लगा रहा था। नौ देवी मंदिर जिस गुफानुमा चट्टान में स्थित था उसमें पानी की बूंदों चट्टान पिघल पिघल कर लटक कर सुन्दर और आकर्षक स्वरूप प्रदान कर रही थी। मंदिर के बाहर जाने वाले रास्ते से निकलने पर बड़ा सा झरना इस जगह को और खास बना देता है। थोड़ा और आगे बढ़े तो बहुत बड़ी जगह में नहाने के लिए बड़े बड़े टैंक सीमेंट से निर्मित किए गए हैं। इन टैंकों के चारों ओर सीमेंट से ही झोपड़ीनुमा बैठने के स्थान बनाए गए हैं जहां लोग कपड़े चेंज कर सकें और बैठ कर आराम कर सकें। टैंकों में कृत्रिम रूप से ताजे पानी की सप्लाई की गई थी। एक ओर मार्केट बनाया गया था जहां जम्मू कश्मीर की बनी चीजें बिक रहीं थीं। सभी ने खूब धमाल मचाया। जब खूब थक गए तो वापिस कटरा पहुचे। बस स्टैंड के पास ही चल रहे भंडारे में कढ़ी चावल खा कर, होटल से सामान उठाकर कटरा स्टेशन को निकल लिये।

नरेन्द्र मगन (कासगंज)
9411999468

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