माता-पिता

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पाल-पोस कर बड़ा किया,
जिसे अपना खून पिलाया।
आज उसी औलाद ने,
वृद्धाआश्रम पहुंचाया।
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पहली बार वो तब मरे जब
बच्चों की तेज हुई आवाज।
रही-सही भी खत्म हुआ,
जब घोर हुआ अपमान।
?
निस्वार्थ प्रेम माँ-बाप का,
देते जी भर कर आशीष।
बच्चों के खुशी के खातिर,
खुद कटाते अपना शीश।
????—लक्ष्मी सिंह ??

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