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“माटी , हिंदुस्तान की “

hritik kotle

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कविता

November 15, 2017

हिंदुस्तान की माटी ये , खुद इतिहास बनाती है ।
हुए हजारों वीर यहां , ये उन की गाथा गाती है ।
मैं इस जग में आया जब , माटी ये हृदय को भायी थी ।
मैं खेला था इस माटी में , ये माटी मैंने खाई थी ।

इस माटी से अस्तित्व जुड़ा , इस माटी संग में हुआ बड़ा ।
इस मिट्टी का मैं अंश हूँ एक , इस माटी का मैं हूँ पुतला ।

अब रगों में मेरी रक्त के संग , ये माटी है यूँ बह रही ।
कर्त्तव्य निभा तू देश प्रति , ये माटी मुझसे कह रही ।

मैं देश समर्पित होने चला जो , दूर खड़ी माँ रही थी रो ।
उन आँखों में वो आँसू डर के , कहीं खो ना दूँ ।
मैं अपने लाल को ।

जब हुआ सामना दुश्मन से , सीमा पे ये माटी साथ थी ।
लड़ रहा था जब मैं देश की खातिर , ये माटी मेरे जज्बात थी ।

इक गोली मेरे तन पे लगी , और रक्त की धारा तन से चली ।
मानो माँ के हृदय को ठेंस लगी , जब मेरी रक्त की बुँदे ।
इस माटी में मिली ।

फिर छल्नी होकर तन ये मेरा , गिरा गोद में माटी के ।
लिपट गईं तन से ये मेरे , लिपटी मेरी छाती से ।

मेरा रक्त बहा माटी में मिला , कर माँ को याद मैं मरने चला ।
तड़प रहा था पर ज़िंदा था मैं , कुछ जीवन मेरा शेष था ।
मुझे याद रहेगा मरकर भी ये , कि भारत मेरा देश था ।

चंद वो अंतिम साँसें मैंने , माटी की गोद में काटी थी ।
मर गया मैं लेकिन मुट्ठी में , मेरी मातृभूमि की माटी थी ।

जब जलकर तन मेरा राख बना , वो राख भी इस माटी में मिली ।
गया जहाँ भी राख में बनकर , ये माटी मेरे साथ चली ।

इस हृदय मोहिनी माटी से , बिन मांगे माँ का प्यार मिला ।
और ममता मुझे दिन – रात मिली ।
मानो जीवन ढलती शाम था मेरा , आँचल में इस माटी के ।
इक मुझको नयी , प्रभात मिली ।

जो ख़ुशी ना जीवन दे सका , मरकर वो इसके साथ मिली ।
@ इक माँ ने जन्म दिया मुझको और , ये माटी दूजी मात मिली @

ये माटी हिन्द महान की , ये गाता वेद – पुराण की ।
तुझे उदबोधन दे रहा हूँ माँ , सुन पुकार संतान की ।

तेरा मूल्य मेरे प्राणों से बढ़कर ,,,,,,,,,
तेरा मूल्य मेरे प्राणों से बढ़कर,,,,,,
क्योंकि,
तू माटी हिंदुस्तान की , तू माटी हिंदुस्तान की ।

✍✍ — ऋतिक कोटले

Author
hritik kotle
I am a student of class 12th . I hope meri poems aapko pasand aayegi . aap sabhi isi tarah mujhe support kare . thank you
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