कविता · Reading time: 1 minute

माज़ी

याद माज़ी की जब भी आती है.,
पूछ मत किस क़दर रुलाती है.!
यूँ समझ ले कि ज़िन्दगी उस दम.,
ग़म के दरिया में डूब जाती है..!!

( ख़ुमार देहल्वी )

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