कविता · Reading time: 1 minute

मां

एक रोटी मिली जली हॉस्टल के खाने से
फिर कुछ ना हुआ रोने चिल्लाने से
लाख की शिकायत पर कुछ बात ना बन पाए
थक हार के मां तेरी रोटी याद आई
आज फिर मेरी आंखें मैं तेरे लिए भर आई

सुबह में नाश्ता और घंटों की क्लास की
दोपहर को लंच कैंटीन की चासनी
इन सब से अब दूरियां मां तेरे खीर की महक आयी
आंखें खुली फिर वही हॉस्टल दिया दिखाई
मां आज फिर मेरी आंखें तेरे लिए भर आई

वक्त बदला जिम्मेदारियां बढ़ी
कुछ जरूरत है मुझे शहर तक खींच लाई
कुछ सपने थे मेरे, उन सपनों नहीं
तेरे आंचल से दूरियां बढ़ाई
मां आज फिर मेरी आंखें तेरे लिए भर आई

भाग सपनों के पीछे
दर बदर ठोकर खाई
मिले कुछ लोग अपना कहने वाले पर
उन सब ने औकात दिखाई
थक हार के बस एक ही चीज समझ आई
जो सुकून तेरे आंचल में
दुनिया की शान और शौकत ना दे पायी
मां आज फिर मेरी आंखें तेरे लिए भर आई

*अनंत*

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