मां

तपती धरती पे ठंडक जैसी होती है मां।
जिसके लबों पे कभी भी होती नही ना।

मां तो होती है जून में ठंडी छाया सी।
निर्धन के सपने में होती है माया सी।

मां की ममता से हर घर में हरियाली है,
पिता लगाए पौधा माँ बाग की माली है।

शाम का सूरज ढ़ले जब निंदिया सताए।
सातों सुर मिल जाएं जब मां लोरी गाए।

मां दिल की दीवारों में तेरी ही सूरत है।
मन मंदिर में केवल मां तेरी ही मूरत है।

मां रोटी को छूले तो प्रसाद बन जाता है।
सारा ही सुख माँ की आगोश में समाता।

मां की हर बात वरदान से बढके लगे।
मां की सूरत”शीला”को भगवान से बढके लगे।

Sheela Gahlawat
Works at Yoga practitioner
Works at Poem Recitation
Studies PG.Diploma in Naturopathy
M. 9888921147

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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