मां

मैं रात भर जगाता हूँ , वह मुझे देख मुस्कराती है ,
दिन भर उसे लोक मर्यादा जगाता है,
मुझे नहीं पता वह कब सो पाती है ,
लेकिन वह मुझे बार बार देख मुस्कराती है ।
मां सृजना है ।
तात के शुक्र को उर्वरता दे जाती है
अपने ही भोजन से मुझे पोषण दे जाती है ,
अपनी श्वाशों से ही मुझमें ऊर्जा फूंक जाती है ,
मेरी लातो को सहते हुये मुस्करा जाती है,
मां सृजना है।
मेरे उत्सर्जन को देख खुश हो जाती है,
दिन एक न हो तो व्याकुल हो जाती है,
मेरा उत्सर्जन देख मेरी हालत पता लगा जाती है,
माघ की ठंडी में भी गीले विस्तर में वह मुस्करा जाती है,
मां सृजना है।
दिन के उजाले मे घर में खुशी फैलाती है,
दिये की रोशनी में फिर मेरे लिये कपड़े बनाती है,
मेरा लाल पहनेगा ये सोच मंद मंद मुस्काती है,
अपनी साड़ियों से ही मेरे लिये विस्तर बनाती है,
मां सृजना है ।।

,,,,,, डॉ॰ गौरव त्रिपाठी असिस्टेंट प्रोफेसर राजनीति विज्ञान, राजकीय पी जी कालेज लालगंज मीरजापुर ।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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