Nov 17, 2018 · कविता
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माँ

बैठकर मेरे सिरहाने, नींद मीठी सी सुलाने थपकियां देती रही।
दुख के कांटे खुद सहे मुझको दी खुशियों की लड़ी।
मुश्किलें आई तो, थी तेरी दुआ आगे खड़ी।
मेरे बतलाने से भी जो दुनिया नहीं समझी कभी।
वो मेरे खामोश चेहरे ने तुझे कैसे जताया ?
तू मुझे समझी सदा,पर मैं कभी भी समझ न पाया।
भीड़ से हटकर के आगे तूने ही बढ़ना सिखाया।
कब रहूं बेफिक्र मैं और फिक्र कब, कैसे करूं?
मैं कहां था जानता, मां सब तो तूने ही बताया।
मैं बड़ा हो जाऊं कद से ही नहीं कर्मों से भी
तेरी इस अभिलाषा ने तुझे कितनी रातें हैं जगाया ।
खुद को खुद से कर जुदा तूने मुझे किया बड़ा ।
तेरे आंचल में मिली जन्नत मुझे मेरे खुदा
है ये ख्वाहिश ही नहीं दिल में मेरे कि करूं मैं चारों धाम ।
संग रहे साया सदा तेरा, मेरे ओ प्यारी मां।
तेरे आंचल के तले बीते ये मेरी उम्र तमाम।
मुझको कद्र-ए- काबिल बनाने वाली मां तुझको सलाम।

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आकाश से ऊँची, धरती सी महान हो... है एक ही तमन्ना कि पूरा मेरा अरमान... View full profile
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