" मां "

” मां “

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सुना है रहबरों के किस्से
बड़े सुहाने होते है ।
मां तो मां होती है मां के
किस्से कहां पुराने होते है।।
मां की ममता का कोई मोल
नहीं होता है यारो ।
उसके आंचल में छिपी
सारी दुनिया के खजाने होते है।।

अपने खून से सिचने वाली मां होती है
गर्भ में नौ माह पालने वाली मां होती है।।
खुद मौत को गले लगाकर नयी जिंदगी
देने वाली कोई और नहीं यारो मां होती है ।।

मां मुझको सीने से चिपकाकर
खुद गिले बिस्तर पर सो जाती है ।
मां मुझे सुलाने की खातिर
कई रातें जाग बिताती है।।

मां की लोरी सुन सुन कर
खुद अम्बर भी सो जाते है ।
मां की मधुर ध्वनि में सातों
सुरो के कीर्तन होते है।।

मां गीता जैसी पावन है
मां मरियम और खदीजा है।
है मां की जैसी कोई और नहीं
मां मक्का और मदीना है ।।

मां रामचरित की सीता है
मां भ्रमरगीत की राधा है।
मां की जैसी कोई मूरत नहीं है
मां वृंदा वन का कोना कोना है।।

मै हाथों से बालों को नोचू
पैरों से मां पर प्रहार करू।
मां रोष तनिक ना करती है
मां गोंद में ले पुचकारती है।।

मुझे बुरी नजर ना लग जाये
मां क़ाला टीका करती है ।
ना दुनियां की काली साया पड़े
मां आंचल तले सुलाती है।।

मां से अच्छी किसी ईश्वर
की मूरत नहीं होती।
मां है तो फिर किसी मंदिर
की जरूरत नहीं होती।।

मां के चरणों में मै सारे
तीरथ का फल पाता हूं।
मां के चरणों को छू कर
मै भी गंगा जल बन जाता हूं।।

मां भोर किरण की लाली है
मां चन्द्र किरण सी उजली है।
मां सी नहीं कोई तस्वीर बनी
मां से ही मेरी तकदीर बनी है ।।

मां संस्कारो की रेखा है
मै मां के चरणों में लेटा हूं ।
मां पुण्य का लेखा जोखा है
मां नहीं है जिनकी मै उन माओ का बेटा हूं।।

मां गंगा की गहराई है
मैं माता की परछाई हूं।
मां रिश्तों की गहराई है
मै उसकी खून से जाई हूं।।

मां के चरणों में जीवन का
सारा सुख मिल जाता है।
मां छूले जिस पत्थर को
वो भी पारस बन जाता है ।।

मां हर घर में पूजी जाए
ऐसा मै वचन दिलाता हूं ।
दुनियां भर की माओ के
मै चरणों में शीश झुकाता हूं ।।

नोट :- जाई – जन्म लेना

“””””””””””सत्येन्द्र प्रसाद साह त्येन्द्र बिहारी”””””””””

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