मां

**** माॖं ****
प्रकृति की अतुल्य रचना है तू , संस्कृति की अनमोल संरचना है तू ।
जगत की जनन बिंदु है तू , अनुपम ममता की संसार और सिंधु है तू ।
चांद -सूरज की आधार और परिक्रमण बिंदु है तू ।
तू अटल है , तू ही सकल है , तू अजर है , तू अमर है , तू ही जल है , तू ही निर्मल है ।
तू ही शक्ति है , तू ही प्रबल है ।
तू ही गगन है , तू ही मेरी अनमोल चमन है ।
तू ही गीत है , तू ही मेरी अक्षुण्ण संगीत है ।
इस भव -भूतल में , केवल तू ही अमृत है ।
तू ही पवित्र आत्मा की आधार ।
तू ही मनु सोंच की संसार ।
तू ही प्रेम है , तू ही मेरी धर्म है ।
तू ही अमर तत्व है ।
तू ही पृथ्वी-घूर्णन की जड़त्व है ।
और तू ही मेरी मर्म है ।
तू ही अज है , तू ही जलज है ।
तू ही मंदिर की मूरत है ।
निर्मल गंगा से भी खूब सूरत है ।
तू ही रूप है , तू ही धूप है , तू ही आस है , तू ही मेरी अटुट विश्वास है ।
पवित्र मन की हर रंग है तू ।
हर दुःख-दर्द में ,नि:स्वार्थ , नि:शर्त हर वक़्त मेरी संग है तू ।
तू ही त्याग है , तू ही ममता की जड़ और सुकुन छांव है तू ।
तू ही मेरी प्रेम की पराग है ,और तू ही अप्रतिम अंतर्मन की राग है ।
राग की जननी जान है ,मां तेरी ममता कितनी महान है ।
तेरी शक्ति से न कोई अनजान है ।
इस धरा पर मां केवल तू ही भगवान है ।
इस धरा पर मां केवल तू ही भगवान है।।
————****———
बी पी पटेल ,।
बिलासपुर, छ.ग.

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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