कविता · Reading time: 1 minute

मां

माँ
माँ उठो! कब तक सोती रहोगी,
रोज़ तो मुर्गे की बाँग से पहले जाग जाती थी,
मुँह-अँधेरे तेरे गोबर से आँगन लीपने की सरसराहट,
मेरी नींद उखाड़ दिया करती थी,
चल उठ ना! इतनी बड़ी-बड़ी उलझी लटों में तेल कौन लगायेगा?
स्कूल जाने के लिये देर हो रही है,
अब्बा,रहिमन चाचा,सन्नो चाची,दीदी-भैया देखो ना!
कितने लोग खड़े हैं तुम्हें देखने को,
माँ अब कोई शरारतें नहीं,और रोटी नहीं माँगूगी,
वो तेरी लाल ज़री वाली साड़ी पहनने की ज़िद नहीं करूँगी!
बस माँ एक बार उठ जा! ये लोग कहते हैं तू कभी नहीं उठेगी…
तेरी बिटिया के कहने से भी नहीं उठेगी..!
ये काहे तुझे हल्दी का लेप,सोलह सिंगार काहे कर रहे हैं?
माँ उठ जा ना! देर हो रही है मुझे स्कूल जाना है!
नहीं उठेगी तो अब्बा की डाँट से मुझे कौन बचाएगा?
कौन मुझे छुप-छुपकर पैसे देगा..!
मेरी छोटी-सी बात से तू इतनी नाराज़ हो गयी!
कह दिया दूर जा रही हूँ,
तू सच में इतनी दूर चली गयी!
उठ ना!वरना रो दूँगी! चल उठ भी ‌जा..मेरी प्यारी माँ!

#अनीता लागरी “अनु”

जमशेदपुर(झारखंड)

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