मां!!

*मां!!*

सुना है! पुराना हो गया है मां का आंचल!
जब से पहलू में बीवी आई है,उसके आंचल की खुशबू में घुला,भूल रहा हूं मैं, मां के आंचल की
वो भीनी,घी-मसाले मिली,स्नेह-ममता की मधुर चाशनी में लिपटी,मीठी महक!!
मन ही मन कसमसाता हूं,,,,
नन्हें बेटे की परवरिश में तल्लीन उसकी मां को देखकर,
कितनी शिद्दत से लगी रहती है,सबकुछ भूलकर, तापसी सी!
महसूस कर रहा हूं…….वही सब जो किया था मां ने मेरी।
बहुत सुविधाएं हैं आज,बेटे की मां के लिए,,, मगर,,,मेरी मां तो बहुत अभावों में
पालती थी मुझे,, आंसू पोंछते हुए।
साफ धुली हुई,झीनी ओढ़नी से,बार-बार पौंछती थी
मेरा लाल मुखड़ा,जब मैं मुंह से झाग निकालते हुए
कहता था कुछ, अर्थपूर्ण-अनर्गल,समझ लेती थी मां और
देती थी उत्तर,,उसी भाषा में,मीठी सी तुतलाहट के साथ।
मुस्कुरा देता था, करके गीली,वो गुदड़ी;जो बनती थी,मेरे दादाजी की सफेद धोती से
खास, कुलदीपक के लिए।
इन बाजारी गद्दियों में;वो आनन्द कहां है!!
मां की छाती से चिपट,दूध पीते-पीते
सूझती थी शरारत और निकाल देता पूरी घूंट बाहर।
तब भी मां हंसते हुए,पौंछ लेती थी हर शरारत
अपने आंचल से।
गुनगुने पानी से भरी परात में,हौले-हौले नहलाकर
लपेट लेती थी अपने आंचल में,और पौंछ लेती सारी हरारत
सजाकर,लगाती काला टीका,लिटा देती भरकर पेट पालने में।
ये सिलसिला,, बहुत देर चला था,
मां हजार दुखों में भी देखती थी
मेरी आंखों के सपने, मेरी आंखों से।
आज!मेरी मां बूढ़ी हो गई है!वो बच्चा हो गई है!!
पर, मैं कभी मां नहीं हो सकता
मैं तो उसके अरमानों वाला,बेटा भी नहीं हो सकता;
क्योंकि,,,,,ओढ़ ली हैं मैंने अनजानी,असीमित,जिम्मेदारियां।
पति की,पापा की,बॉस की,समाज के ठेकेदार की,,,दिखावे की और फरेब की!!
मां करती है इंतजार,घर के एक अलग कमरे में,
अब वो खांसती है,खंखारती है!धीरे-धीरे कुछ बड़बड़ाती है!
वो दुआएं ही पढ़ती होगी,क्योंकि,,,,वो मां है न मेरी!!!

*विमला महरिया “मौज”*
लक्ष्मणगढ़ (सीकर), राजस्थान

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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