मां गंगा

युगों युगों से इस धरती पर
अपना प्यार लुटाती गंगा ||

अमृत जैसे जल को देकर
तन मन शुद्ध बनाती गंगा ||

उपजाऊ मैदान बनाकर
सोने को उपजाती गंगा ||

लें संकल्प न फेंके कचरा
निर्मल है पावन है गंगा||

नादानों मत करो प्रदूषित
जीवनदाई मां है गंगा ||

द्वारा-:
डॉ रीतेश कुमार खरे ‘ सत्य’
मोहल्ला कटरा बरुआसागर
जिला झांसी उत्तर प्रदेश
पिन कोड 284201
मोबाइल संख्या 9935296788

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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