मांँ

वो माँ ही तो है, जो दुनिया से हमें
नौ महिने ज्यादा जानती है ।
हमारे हर दर्द लाख छुपाने पर भी
वो आँखों से पहचानती है ।।
खुद खाने से पहले सदा,
हमें भोजन कराती है ।
हमारी हर जरुरतों को वो,
हमसे पहले जान लेती है ।।
वो कोर माता के हाथों का,
वो स्वर्ग माता के चरणों का ।
बनकर रह जाएगी एक दिन,
हिस्सा हमारे स्मरणों का ।।
वेद-पुराण का सार है माँ,
सृष्टि का आधार है माँ ।
ईश्वर के भिन्न रूपों का,
धरती पर अवतार है माँ ।।
वह दिव्यानंद जो,माता के गोद में आता है ।
संसार में दूजा कही और, ना मिल पाता है ।।
धरती पर अपना पहला कदम रखना,
मैंने माँ से ही तो सीखा है।
मैं ज्यादा क्या लिखूं उनके बारे में ,
जिसने खुद मुझे लिखा है ।।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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