कविता · Reading time: 1 minute

माँ

अपने चेहरे में दिखती है मुझे तेरी सूरत मां,
देखूं जहां भी दिखती हो तुम ही तुम हर सू मां।
मेरी सांसों में घुली है तेरी ममता की गरमाहट,
मेरी धड़कन में है इक तेरा ही नाम मां।

तेरी याद आते ही याद आ जाता है बचपन,
गिरते-उठते संभाला हरदम तेरी ही बाहों ने मां।
नहीं सहे जाते अब दुनिया के ज़ुल्मो-सितम,
बेटी हूँ तुम्हारी मगर कहाँ से लाऊँ तेरे जैसी हिम्मत माँ!!

आज फिर ज़रूरत है मुझे तेरी माँ।
चाहूं आंसू पोंछता हाथ तेरा वो ममता भरा आंचल,
नहीं सही जाती अब ज़िंदगी की कड़ी धूप मां,
पेड़ बन कर इस जीवन में छांव कर जाओ मां।।

जी चाहता है छुप जाऊं तेरी गोद में मां,
ढूंढ न पाए मुझे कोई गम कोई दु:ख मां।
तेरे कंधे से लग कर रोऊं आज ज़ार-ज़ार,
भिगो दूं तेरा आंचल आज आंसुओं से मां।।

याद आती है तेरी जब कभी शिद्दत से,
खुद को आइने में देख लेती हूं मां।
तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब हूं मैं, छवि हूं तुम्हारी,
संभालती हूं फिर यही सोच कर मैं खुद को मां।।

****

नेहा शर्मा
मोहाली
पंजाब

Competition entry: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता
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