माँ

आज लिखनी थी ऐसी गजल,
जो छू जाए सभी का मन।
आज लिखनी थी ऐसी कविता,
जिसमें समाया हो जीवन दर्शन।
आज लिखना था ऐसा कोई गीत,
जिसमें खिला हो जीवन सुमन।
लिखना था दोहा और कोई चोपाई,
प्रकृति प्रेम की जिसमें हो समाई।
लिखनी थी मुझको एक कुंडली,
जिसमें दिखे सब जगत मण्डली।
बनानी थी मुझको छोटी क्षणिका,
जो समेटे हो खुद में जमी, आश्मा।
लिख दिया सब मैंने एक शब्द में,
ये सभी कुछ है जिसमें माँ माँ माँ।
रचनाकार: जितेंन्द्र दीक्षित,
पड़ाव मन्दिर साईंखेड़ा।

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