"माँ"

“माँ”
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“माँ” शब्द को परिभाषित करना आसान नहीं है क्योंकि इस एक शब्द में समस्त सृष्टि समाहित है। माँ तो साक्षात् ईश्वर की छवि है। माँ के कदमों में ज़न्नत है।ऐसे वृहद “माँ” शब्द को शब्दों में बाँध पाना नामुमकिन है।माँ के आगे सही-गलत की परिभाषा भी बदल जाती है क्योंकि माँ सिर्फ़ माँ होती है जो पुकारने मात्र से बच्चे की सारी पीड़ा हर लेती है।माँ तो बच्चे की वो ढाल है जो जीवन पर्यंत उसे सुरक्षा प्रदान करती है।माँ बच्चे की जीत का सबसे बड़ा हथियार है उसके अधरों की मधुर मुस्कान है, मीठी लोरी है, शीतल चाँदनी है, घाव की मलहम है, दिल का सुकून है । माँ से घर -घर है।माँ के आँचल की छाँव में आकर बच्चा सारा दु:ख -दर्द भूल जाता है। सबकी डाँट से बचाकर सुख देने वाली केवल माँ ही हो सकती है।जब माँ थी तो उसकी कद्र नहीं जानी आज माँ नहीं है तो उसकी याद में आँसू बहाकर “मातृदिवस” मनाया जा रहा है। जिस माँ ने बच्चे की खुशी के लिए अपने सारे अरमान, सुख-चैन , धन-दौलत समर्पित कर दिए वो अंतिम समय दो मीठे बोल सु नने को तरसती इस दुनिया से चली गई। आज माँ नहीं है पर मेरी रगों में बहते लहू के रूप में वो मेरी रग-रग में समाई है।ज़रा सा भी कष्ट होता है तो सबसे पहले मुँह से “माँ” ही निकलता है।हर पल ऐसा लगता है जैसे वो मेरे सिरहाने खड़ी मुझसे कह रही हैं-“तू चिंता क्यों करती है? मैं हूँ ना तेरे साथ।” माँ को याद करके आज आँसू नहीं रुकते हैं। जब भी कभी मैं बीमार होती थी तब वो मेरा सिर गोद में रख कर सहलाती रहतीं, कॉलेज से आने में ज़रा सी देर हो जाती थी तो दरवाज़े पर खड़ी मेरा इंतज़ार करती नज़र आती थीं। मेरी खुशी के लिए पूरे ज़माने से लड़ लिया करती थीं। कॉलेज कहीं भूखी न चली जाऊँ..ये सोचकर चिल्ले जाड़े में उठकर मेरे लिए अज़वाइन के पराठे सेंकतीं और एक-एक कौर मुँह में खिलातीं। कैसे भूल सकती हूँ उस परिचय को जो संसार में माँ ने मुझे दिया।भगवान संसार में स्वयं नहीं आ सकते थे तो उन्होंने माँ को इस दुनिया में भेज दिया।कहते हैं यदि आपके पास धन-दौलत नहीं है तो भी आप गरीब नहीं हैं क्योंकि आप परिश्रम करके दो वक्त की रोटी कमा सकते हैं लेकिन यदि आपके पास माँ नहीं है तो दुनिया में आपसे अधिक गरीब कोई नहीं है। त्याग- तपस्या , समर्पण की प्रतिमूर्ति माँ के चरणों में सारे सुख निहित हैं। माँ ही मंदिर है, माँ ही मसजिद है, माँ ही काशी है, माँ ही काबा है। आज सब कुछ है मेरे पास पर माँ के हाथों की बनी रोटी की सौंधी महक नहीं है, अथाह प्यार है पर माँ की डाँट का मिठास नहीं है, मान-सम्मान है पर माँ की फटकार में छिपा प्यार नहीं है, मखमल का गद्दा है पर माँ की थपकी और लोरी की आवाज़ नहीं है , गाड़ी-घोड़े सब हैं पर माँ की अँगुली का साथ नहीं है। काश…माँ ! तुम मेरे पास होतीं तो देख पातीं कि आज मैं तुम्हारे आँचल को याद करके कैसे तकिये भिगो रही हूँ , आज मेरा माथा चूमकर सीने से लगाने वाला तुम्हारा वात्सल्य मेरे साथ नहीं है। मैं टकटकी लगाए तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रही हूँ। स्वार्थी रिश्तों की इस निर्मम दुनिया में खुद को अकेला पाकर अपने बचपन को याद करती मैं तुम्हारे आँचल की सुखद छाँव ढूँढ़ रही हूँ । सच माँ आज तुम मुझे बहुत याद आ रही हो।

बारिश की बूदों में माँ तू, मेघ सरस बन जाती है।
तेज धूप के आतप में तू ,आँचल ढ़क दुलराती है।

तन्हाई में बनी खिलौना ,आकर मुझे हँसाती है।
आज कहे रजनी माँ तुझसे ,याद बहुत तू आती है।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
महमूरगंज, वाराणसी, उ. प्र.
संपादिका-साहित्य धरोहर

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