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माँ

लक्ष्मी सिंह

लक्ष्मी सिंह

लघु कथा

August 5, 2017

????ॐ नमःशिवाय????
लघु कथा ,
आज दुर्गा बहुत परेशान है।रात के दो बज रहे है।धरती -आकाश सब सो चूके है।पर,उसके आँखों में नींद कहाँ,गला दर्द से रूँध गया था।सीने के दर्द से छाती फटा जा रहा था।दिल कर रहा है अभी चिल्लाकर रो दे।पर बगल मे पाँच साल की नन्हीं परी जो सो रही है ।वह जाग जाएगी।वह रो भी नहीं सकती है। वह गहन सोच में पड़ी है कि अब दुर्गा क्या करे? उसे पता चल चुका है कि उसके गर्भ में जो नन्हीं जान पल रही है वह बेटी है।घरवालों के दबाब में आकर पति के साथ पता कराने चली तो गई पर अब लड़की है। क्या करे? शाम को मैके भी फोनकर के पूछी सभी ने कहा खराब कर दे…एक बेटी है,ही दूसरा बेटा होगा तब रखना।बेटी है ,मत रख ।ससुरालवाले का तो समझ में आता है जो कह रहे हैं। दुर्गा को मैके वालों से ऐसी उम्मीद ना थी।ससुराल वाले ना सही कम से कम वो तो साथ देते..।रात इसी ओह -पोह में गुजर गई…।सबेरे उठी पति ने कहा तैयार रहना ।मैं आज आॅफिस से जल्दी आऊगा …डा0 के पास चलना है..।उसने कोई जबाब ना दी …।बेटी को स्कूल पहुचा आई।स्नानकर माँ के आगे जोत जलाकर पूजा करने बैठ गई। वैसे दुर्गा नितकार्य निबटा कर बिना पूजा किये अन्न ग्रहण नहीं करती थी। उसे शिव -पार्वती में बड़ा ही आस्था था।आज तो वह धर्म संकट में थी ।ऐसे में पूजा-पाठ कैसे छोड़ देती। आज तो दुर्गा को पूजा पर बैठने की और भी जल्दी पड़ी थी।कमल आसन लगाकर बैठ तो गई ।पर मुख से एक भी मंत्र का उच्चारण ना कर पाई ।मुँह बंद आँख से आँसुओं की धार बहने लगी।काफी देर दुर्गा इसी अवस्था में बैठी रही।उसके आँसुओं के साथ उसके सारे दुख बह गए।वो निर्णय ले चूकी थी।उसने आँखें खोली और भगवान से बोली आप ने जो फूल मुझे दिया है उसे सम्हालिये और हमें शक्ति दे।माँ तेरी दुनिया ऐसी क्यों है?मेरे गर्भ में बेटी है तो सब इसे मारने कह रहे है।यही बेटा होता तो इसे कोई नहीं मारता।माँ ऐसा क्योंहै?माँ पर मै तो माँ हूँ।इस अजन्मी बेटी को कैसे मारूँ।अगर आज मैं आवाज ना उठाई तो मैं इसे खो दूँगी।माँ मैं इसे खोना नहीं चाहती।माँ मुझे शक्ति दे कि मैं इसकी रक्षा कर सकूँ।माँ तुने जो फूल दिया है ।उसे सम्महालो माँ।माँ मैनें फैसला ले लिया है मुझे क्या करना है।माँ मेरा साथ देना।माँ बस एक तेरा सहारा है ।दुर्गा का पति आज बहुत ही जल्दी आ गया। उसने कहा ये क्या तुम तैयार नहीं हुई चलना है ।जल्दी करो ।मैं तो तुम्हें बोल कर गया था।दुर्गा बोली मैं नहीं जाऊगी मै इस बच्ची को जन्म दूँगी ।तुम भी मेरा साथ दो।यह सुनते ही पति आग बबूला हो गया..।ये क्या कह रही हो तुम ..।बेटी को जन्म दोगी पहले से एक है काफी नहीं।दुर्गा बोली मेरी बेटी ही बेटा है।मुझे बेटा की चाह नहीं।हाँ अगर आप इसे मारना चाहते है तो इसके साथ मुझे भी समाप्त करना पड़ेगा।दुर्गा का पति परेशान हो गया वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था।पर मन में बेटे की चाह..।क्या करे वह कुछ समझ नहीं पा रहा था।और दुर्गा के ऊपर तो दुर्गा सवार थी ।वह कहाँ किसी की सुनने वाली।पति समझाता रहा पर वह नहीं मानी ।आखिरकार सभी को दुर्गा के सामने हार माननी पड़ी। नौ महीने में दुर्गा के गर्भ से एक सुन्दर पुत्री पैदा ली ।दुर्गा ने निर्णय ले ली कि वह आगे बच्चा पैदा नहीं करेगी।अब यही दोनों बेटी ही उसकी दुनिया है।दुर्गा का पति भी उससे बहुत प्यार करता था।वह एक अच्छा इन्सान था ।क्योकि उसने दुर्गा के लिए अपनी और परिवार की इच्छाओं की कुर्बानी दी।वरना इस कहानी का अन्त कुछ और होता।दुर्गा घर से निकाल दी जाती।दुर्गा मर भी सकती थी।वैसे दुर्गा को इन बातों का तनिक भी डर नहीं था। वह हर तुफान से टकराने को तैयार थी।इन नौ महीना में उसने बहुत कुछ सहा पर आज अपनी बेटी का चेहरा देख सब भूल गई…।उसके सारे दुख-दर्द उस मासुम के किलकरियों में खो गई….।
ये एक सच्ची कहानी है इसमें कोई मिलावट नहीं ।ना ही कहानी को रोचक बनाने के लिए तथ्यों को जोड़ा गया है।
—लक्ष्मी सिंह?☺

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Author
लक्ष्मी सिंह
MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is a available on major sites like Flipkart, Amazon,24by7 publishing site. Please visit my blog lakshmisingh.blogspot.com( Darpan) This is my collection of poems and stories. Thank... Read more
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