माँ

कोटि- कोटि प्रणाम तुम्हें,
क्या रचना खूब विधाता की।
सृजन समाज का किया बाद में,
पहले रचना की माता की।।

पूर्ण पवित्र ‘शब्द’ जग में ,
दर्शन कर नहीं है अघाता जी ।
अत्यंत सुशोभित मूरति मन में ,
उपमा न मिले इस नाता की ।।

दुर्जन भी सज्जन बन जाते ,
जब पड़े नजर निज माता की ।
रोते बच्चे भी मुस्काते,
जब करते पान पयोधरि माता की।।

मम्मी, मैया ,अम्मा ,या माम,
श्रुत स्रवनैन सुख पाता जी।
चतुर्थ चरण सभी मां कहते,
जीवन भर पुत्री ,पुत्र ,बहू, जमाता भी।

उपमा अवर्णनीय रह जाती ,
चल जाती अचला, सूर्य स्वयं जल जाता भी ।
ऐसी महिमा, प्रणाम तुम्हें,
कण -कण कहता जय माता की।।

शिवेंद्र कुमार श्रीवास्तव
रायबरेली

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