माँ

माँ , माँ , माँ
माँ शब्द है ऐसा,
जिसने है सृष्टि रचा।
मां शब्द को सुनते ही, हर रोम रोमांचित हो उठा।
इस शब्द में इतनी ताकत है,
हर मुश्किल इससे आहत है।
इस माँ को मैं प्रणाम करूं,
जिसके चरणों में जन्नत है पड़ी।

हम तुलना उनकी कर न सके,
और करें तो सब फीके पड़े।
जिसने भी माँ को समझा है,
ये सबसे बड़ा बड़प्पन है।
हम माँ के जब भी पास खड़े,
मुश्किल हमारी कदमों के तले।
ये एहसास मेरी माँ ने दिया,
यह विश्वास मेरी माँ ने है दिया।
यह सच है, है सच यही।

हम माँ का दिल खिला दिए,
हम क्या कुछ नहीं पा लिए।
यह धन दौलत कुछ भी नहीं,
अगर माँ हमसे है खुश नहीं।
हम माँ पापा को खुश रख पाए ना,
कभी जीवन में आगे बढ़ पाए ना।
हम इनको खुश रख जाते हैं,
जन्नत यही पा जाते हैं।
है ऐसा यह विश्वास मेरा,
यही सच है, है सच यही।

हम जियें तो जियं कैसे?
जैसे माँ ने हमें सिखाया है।
खिलाया है, हँसाया है।
ये खुश किस्मती भी दिलाया है।
माँ, माँ, माँ, माँ, माँ, माँ
यही सच है, है सच है।
संगीता सिंह

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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