माँ

माँ
क्या लिखूं, कुछ लिखने को है क्या?
हर मोड़, हर कदम पर, छवि एक ही,
बेमिसाल त्याग की मिसाल एक ही,
सारी दुनिया जिसके है गुण गा रही, वही, एक ही!
बिन बोले दुःख पहचाना, बिन रोये सब दर्द,
रुक जाए मेरी हंसी का आना, अपना लिए कई मर्ज़|
आंसू एक जो झलका मेरा, सृष्टि हिल गयी उसके लिए,
मेरी एक मुस्कराहट पर, फुलवारी खिल गयी उसके लिए|

दूर हुई जब सालों पहले, हुई न दूर कभी वो मन में से,
जब लगती मिलने पर गले, कितने दुःख मेरे पिघले
दर्द किया न बयाँ डर से, आंसू और न लगें बहने ।
पछताती हूँ कितना अब मैं, बतियाती हूँ चित्रों से मैं,
ललकती हूँ कि सलाह लूँ तुम्हारी,
तरसती हूँ कि परेशानी बाँटूँ मैं सारी,
तरसती हूँ उसी बाहों के घेरे को,
जो कस कर दर्द फेंके बाहर को|
अब बड़ी हूँ तो क्या हुआ, बच्ची तो अब भी तुम्हारी,
अब माँ तो बच्चों के लिए हूँ , पहले तो बेटी हूँ न तुम्हारी?
परमिंदर सोनी
चंडीगढ़

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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