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माँ

माँ
अदृश्य इस संसार में माँ को कोई समझ ना पाया,
भूखे पेट में रह के भी पेट भर तुम्हे भोजन खिलाया।
ऊँगली पकड़ कर जिसने तुम्हे चलना सिखाया,
आज तू उसी माँ की सीने में असहनशील काँटे चुभाया।।

माँ की ममता से तू कही इस जग में प्रकाशित है,
माँ की माया समझने का लाख कोशिश कर।
जीत क्या है?खाव्ब मत देख,हार तो पुरानी है,
भविष्य का निर्माण करने वाली माँ की वाणी है।।

कष्ट प्रद ज़िन्दगी में बस माँ तो एक सहारा है,
अँधेर में भी प्रकाश का एक तो किनारा है।
माँ की सोच से पूरी जिंदगी कट जाती है,
बच्चों के लिए माँ की लक्ष्य बस तारा है।।

राकेश चतुर्वेदी”राही”
जमनीडीह(भंवरपुर)
7354127727

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Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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राकेश चतुर्वेदी
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