Nov 26, 2018 · कविता

माँ

वो शब्द कहाँ से लाऊं, तेरी महिमा जो सुनाऊ |
तू शब्दों से परे है माँ, क्या तुझ पर लिख पाउँ ||
मेरा वजूद तुझसे माँ,तुझमे छुपी है मेरी कहानी|
तू जन्म मुझें देने वाली, क्या तुझपे मैं सुनाऊँ ||
तेरा ऋणी हूँ और इस भारत माँ का भी ऋणी |
मेरी कामयाबी तुझसे,तेरा ऋण ना चुका पाऊँ ||
मंदिरो में भी माँ बस तुम,मुझें तुम नजर आओ|
नजर देदो वो मुझको, हर माँ में तुझे ही पाऊँ ||
देखूँ जो कोई गरीब माँ, सडक पर यूं बैठी हुई |
देख के तेरी सूरत उसमे,बेटे का फ़र्ज निभाऊ ||
जो धरती माँ पर कोई, दुश्मन देश नजर उठाये |
वीर पुत्र बनाना माँ, दुश्मन के छक्के छुड़ाऊँ ||
कहीं अगर जो देखूँ, कोई बहन बेटी मुसीबत में
देना मुझे वो ताकत अस्मत उसकी मैं बचाऊं |
यह मेरी स्वरचित एवं मौलिक रचना है जिसको
प्रकाशित करने का कॉपीराइट मेरे पास है और मैं स्वेच्छा से इस रचना को साहित्यपीडिया की इस प्रतियोगिता में सम्मलित कर रहा/रही हूँ।
मैं साहित्यपीडिया को अपने संग्रह में इसे प्रकाशित करने का अधिकार प्रदान करता/करती हूँ|
मैं इस प्रतियोगिता के सभी नियम एवं शर्तों से पूरी तरह सहमत हूँ। अगर मेरे द्वारा किसी नियम का उल्लंघन होता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी होगी।
साहित्यपीडिया के काव्य संग्रह में अपनी इस रचना के प्रकाशन के लिए मैं साहित्यपीडिया से किसी भी तरह के मानदेय या भेंट की पुस्तक प्रति का/की अधिकारी नहीं हूँ और न ही मैं इस प्रकार का कोई दावा करूँगा/करुँगी|
अगर मेरे द्वारा दी गयी कोई भी सूचना ग़लत निकलती है या मेरी रचना किसी के कॉपीराइट का उल्लंघन करती है तो इसकी पूरी ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ मेरी है; साहित्यपीडिया का इसमें कोई दायित्व नहीं होगा|
मैं समझता/समझती हूँ कि अगर मेरी रचना साहित्यपीडिया के नियमों के अनुसार नहीं हुई तो उसे इस प्रतियोगिता एवं काव्य संग्रह में शामिल नहीं किया जायेगा; रचना के प्रकाशन को लेकर साहित्यपीडिया टीम का निर्णय ही अंतिम होगा और मुझे वह निर्णय स्वीकार होगा|
रीता सिंह
बेंगलुरु
कर्नाटक

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